Mussoorie Forest Range, Dehradun, Uttarakhand

Golden Memories of Indo-Nepal.

Pilibhit Tiger Researve, Pilibhit, Uttar Pradesh.

Golden Memories with my Bro Pintu, RIyaz Ansari, Qayyum and Dr. Mukesh Mirotha from Jamia Millia Islamia, New Delhi.

An Evening in Nepal.

With my Students at MIMT, Dehradun, Uttarakhand.

With my Guruji Mr. Ashok Swarup and my Batchmate at University of Allahaba.

George Everest, Mussoorie, Uttarakhand

Saturday, December 9, 2017

भारत की पहली महिला फोटोग्राफर ‘होमी व्यारावाला’

होमी व्यारावाला
दिसंबर 1913 में मुंबई में एक गुजराती पारसी परिवार में जन्मी व्यारावाला ने 1930 में अपने फोटोग्राफी करियर की शुरुआत की थी. यह वह दौर था जब कैमरा किसी अजूबे से कम नहीं था. एक रुड़ीवादी परिवार में जन्म लेने वाली एक महिला का फोटोग्राफी के क्षेत्र में करियर बनाना किसी आश्चर्य से कम नहीं था लेकिन होमी व्यारावाला ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए न सिर्फ अच्छी फोटोग्राफी की बल्कि अपने बेमिसाल काम करते हुए भारत की पहली महिला फोटोग्राफर होने का गौरव प्राप्त किया और इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया. उन्होंने पहले-पहल अपने मित्र मानेकशां व्यारवाला से तथा बाद में जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट से फोटोग्राफी सीखी।
होमी व्यारावाला द्वारा ली गयी सिगरेट पीते नेहरु की तस्वीर
होमी व्यारावाला ने अपनी बेमिसाल तस्वीरों के माध्यम से भारत के बदलते  सामाजिक तथा राजनैतिक जीवन को खूबसूरती से दर्शाया। उनकी तस्वीरों में उस समय के चर्चित राजनेताओं से लेकर धर्मगुरुओं तक का एक अलग रूप देखने को मिलता है.  उन्होंने जवाहर लाल नेहरूमहात्मा गाँधीलार्ड माउन्टवेटन व दलाई लामा की बेमिसाल तस्वीरें खींची. उनके द्वारा लिए  गए चित्र भारत की स्वतंत्रता से पहले तथा स्वतंत्र के बाद की कहानी वयां करते हैं. उनकी तस्वीरों में हमें इतिहास की झलक मिलती है. भारत की आज़ादी के अगले दिन 16 अगस्त 1947 को लाल किले पर पहली बार फहराये गये झंडेसिगरेट पीते हुए जवाहरलाल नेहरू जो नेहरू की एक अलग छवि को दर्शाती हैलार्ड माउन्टबेटन के साथ अंग्रेजों का भारत छोड़नामहात्मा गाँधीजवाहर लाल नेहरु और लाल बहादुर शास्त्री की अंतिम यात्रा के भी चित्र लिए. व्यरावाला की पहली तस्‍वीर बॉम्बे क्रोनिकल में प्रकाशित हुई थी.
होमी व्यारावाला द्वारा ली गयी नेहरु की अनोखी तस्वीर
वह अपने पति के साथ दिल्‍ली आ गई और ब्रिटिश सूचना सेवाओं के कर्मचारी के रूप में स्‍वतंत्रता के दौर के फोटो लिए. दिूतीय विश्‍व युद्ध के बादउन्‍होंने इलेस्‍ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया मैगजीन के लिए 1970 तक कार्य किया. उनके कई फोटोग्राफ टाईमलाईफदि ब्‍लेक स्‍टार तथा कई अन्‍य अन्‍तरराष्‍ट्रीय प्रकाशनों में फोटो-कहानियों के रूप में प्रकाशित हुए. ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीरें लेने में उन्हें महारत हासिल थी. व्‍यारवाला का पसन्‍दीदा विषय जवाहर लाल नेहरू थे। वे फोटो ग्राफर के लिए उन्‍हें उपयुक्‍त छवि मानती थीं। उनके कई फोटोग्राफ ‘’डालडा 13’’ के अंतर्गत प्रकाशित किए गए थे। यह नाम उन्हें कैसे मिला इसका उन्होंने बड़ा ही दिलचस्प कारण बताया थाउनका कहना था की 13 नम्बर उनके लिए लकी है 1913 में उनका जन्‍म होना, 13वें में उनकी शादी होना और उनकी कार की नम्‍बर प्‍लेट डीएलडी 13’ थीइसलिए उनके साथी फोटोग्राफर डालडा 13’ बुलाने लगे थे.
1970 में पति के निधन के बाद उन्‍होंने फोटोग्राफी छोड़ दी थी. वर्ष 2011 में उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पदम् विभूषण पुरस्‍कार से नवाजा गया। 15 जनवरी 2012 को गुजरात के बड़ोदरा में भारत की पहली महिला एवं महान फोटोग्राफर का निधन हो गया.

Monday, August 14, 2017

प्रथम स्वाधीनता संग्राम और दिल्ली उर्दू अख़बार

भारत के इतिहास में 1857 एक बहुत ही उथल पुथल भरा साल है। यह साल अपने अंदर इतने राज समेटे है कि इसके भेद आज तक नहीं खुल पाये हैं। इसी साल में वर्तमान भारत की बुनियाद रखी गई। करोबार करने के इरादे से भारत में आई इंग्लैंड की ईस्ट इंडिया कम्पनी ने देश में फैले छोटे-छोटे राज्यों की आपसी दुश्मनी का फायदा उठाकर अपनी कुटिल चालों से धीरे-धीरे सत्ता पर कब्जा करना शुरू कर दिया। 1857 तक आते-आते कम्पनी ने भारत के एक बड़े हिस्से पर अधिकार कर लिया था। 
इसी दौर में कम्पनी के जुल्म और ज्यादतियां आपने उरूज पर थीं। 1857 में कम्पनी के इन जुल्मों के खिलाफ भारत के गैरतमंद सिपाही और आम जनमानस ने मिलकर आजादी की पहली जंग लड़ी और शुरूआती दौर में हैरतअंगेज कामयाबी पायी। यह उनका जुनून ही था कि मुट्ठी भर आजादी के दीवानों ने उस दौर में बेहद ताकतवर ईस्ट इंडिया कम्पनी को धूल चटाकर कामयाबी के झंडे बुलंद किये। आजादी की पहली लड़ाई में अंग्रेजों के खिलाफ फूटने वाली बगावत के केन्द्र में चर्बी बाले कारतूस थे जिसने देशी सिपाहियों के दिलों में अंग्रेजों के खिलाफ नफरत के बीच बोये थे। भारतीय सिपाहियों एवं आम जनमानस की बगावत की आवाज़ को बुलंद करने का काम उस दौर के प्रकाशित होने वाले विभिन्न विभिन्न क्षेत्राीय भाषाओं के समाचार पत्र, पत्रिकाआंे ने किया था। यह वह दौर था जब उर्दू भाषा अपने सबसे सुनहरे दौर में थी। दिल्ली, लखनऊ और दूसरी कई जगहों से उर्दू के कई अखबार निकलते थे। इन उर्दू अखबारांे ने भी अपने तरीके से आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था।
वैसे तो भारत में पत्रकारिता की शुरूआत सन् 1780 में ‘हिक्कीज गजट’ से हुई जिसे ‘हिक्कीज बंगाल गजट एण्ड कलकत्ता जनरल एडवरटाइजर’ के नाम से भी जाना जाता है। इसे एक अंग्रेज अफसर जेम्स आगस्टस हिक्की प्रकाशित करते थे। यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र था। इस अखबार के प्रकाशन का एक कारण बाजार के लिए सूचनाएं उपलब्ध कराना था। इसमें अंगेजी प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी के समाचार प्रमुखता से प्रकाशित होते थे। और कभी कभी यूरोप से आयी खबरों का भी प्रकाशन किया जाता था। 
उर्दू का पहला अखबार
कलकत्ता से सन् 1822 में प्रकाशित ‘जामे जहांनुमा’ को उर्दू का पहला अखबार माना जाता है। इसके प्रकाशक हरिहर दत्त और संपादक सदासुख लाल थे। वहीं कुछ विद्वान उर्दू के पहले अखबार को निकालने का श्रेय टीपू सुल्तान को देते हैं। उनका मानना है कि ‘जामे जहांनुमा’ से पहले ही श्रीरंगपट्टम से प्रकाशित होने वाला ‘फौजी अखबार’ उर्दू का पहला अखबार है। इस संबंध में गुरूवचन सिंह चंदन ने लिखा है कि ‘‘उर्दू के पहले अखबार के बारे में हमारे यहां एक दावा और भी है इसके मुताबिक उर्दू का सबसे पहला अखबार 18वीं सदी के आखिर में 1794 के आस पास मैसूर के शासक टीपू सुल्तान ने जारी किया और इसका नाम ‘फौजी अखबार’ था’’1
फौजी अखबार एक साप्ताहिक अखबार था जो मैसूर की सरकारी प्रेस में छपता था। इस अखबार को सिर्फ टीपू सुल्तान के फौजियों को बंाटा जाता था इसके बावजूद आज एक स्वर में ‘जामे जहांनुमा’ को ही उर्दू का पहला अखबार माना जाता है। ‘जामेजहांनुमा’ 27 मार्च 1822 को पहली बार प्रकाशित हुआ था। अपने 6 अंकों के प्रकाशन के बाद ही यह पाठकों की मांग पर अपनी भाषा बदलने पर मजबूर हो गया और जून 1822 से फारसी में इसका प्रकाशन होने लगा था।2 जामे जहांनुमा के बंद होने के लगभग एक साल बाद ईस्ट इंडिया कंपनी ने फारासी के स्थान पर उर्दू को सरकारी भाषा बना दिया था। उर्दू आम बोलचाल में पहले से ही चलन में थी। 1836 में नये अखबार निकालने की आज़ादी दे दी गई थी। उर्दू पत्रकारिता की यह बदनसीबी ही है कि 19वीं सदी के प्रारम्भ में अखबार की फाइलों को सुरक्षित रखने का चलन नहीं था जिसके कारण अधिकतर समाचार पत्र नष्ट हो गए और प्रथम स्वाधीनता संग्राम से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज आज हमारी पहंुच से दूर हैं।
सन् 1822 ई. में कलकत्ता से उर्दू के पहले अखबार ‘जामे जहांनुमा’ के प्रकाशन से लेकर देश की आजादी तक दौर उर्दू पत्राकारिता का दौर बड़ा ही रौशन रहा है। उर्दू पत्रकारिता ने बड़े ही उथल पुथल के दौर में आंखें खोलीं और वह जुल्म और दहशत के साये में परवान चढ़ी। इस दौरान बहुत ही कम मिसालें सामने आयेंगी जब उर्दू पत्रकारों ने किसी तरह की गैर जिम्मेदाराना और पीत पत्रकारिता करते हुए अंग्रेजों का पिट्ठू बनने की कोशिश की हो। 1857 से पहले फारसी, उर्दू और दूसरी प्रादेशिक भाषाओं के अखबार भी अंग्रेजों के खिलाफ थे और उनके लेखन में गम और गुस्से की चिंगारियों सुलग रही थीं। लेकिन 1857 की आजादी की पहली लड़ाई के बाद उन अखबारों के एक नया हौसला मिल गया, उनमें एक नया जोश आ गया था। जंगे आजादी को परवान चढ़ाने में उर्दू पत्रकारिता की भूमिका दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के समाचार पत्रों से कहीं ज्यादा है। 
भारत की पत्रकारित प्ररम्भ काल (1822 से 1857) का अगर जायजा लिया जाये तो यह बहुत हद तक फारसी और उर्दू पत्रकारिता का काल था। इस काल के अखबारों का अध्ययन करें तो पता चलेगा कि इनके लेखों में अंग्रेजों के खिलाफ किस कदर शोले भड़क रहे थे। 1857 के दौर से पहले ही उर्दू सहित दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगाबत का झंडा बुलंद कर रखा था। बगाबत शुरू होने के बाद तत्कालीन गर्वनर जनरल लाॅर्ड कैनिंग ने काॅउंसिल को संबोधित करते हुए कहा था कि ‘‘देशी अखबारों ने समाचार प्रकाशित करने के पर्दे में भारत के नागरिकों के दिलों में साहसी हद तक बगाबत की भावनाएं पैदा कर दी हैं और यह काम बड़ी मुस्तैदी, चालाकी और जासूसी से अंजाम दिया गया है’’3
1857 से पहले ही भारत के आसमान में बगावत के बादल मंडराने लगे थे और उसके साथ ही भारतीय समाचार पत्रों ने कड़वाहट और बेवाकी के साथ अंगेजी हुकूमत की आलोचनाओं की गति तेज की दी थी इस संबंध में दिल्ली, लखनऊ और कलकत्ता के समाचार पत्र उल्लेखनीय हैं। कलकत्ता और बम्बई के अंगेजी अखबारों ने जो ईस्ट इंडिया कम्पनी की कठपुतली थे देशी अखबारों के रोष पर परेशानी व्यक्त करते हुए अंगेजी हुकूमत का ध्यान इस ओर आकर्षित किया। कई अंगेजी समाचार पत्रों ने तो देशी समाचार पत्रों की आजादी छीनने की सिफारिश तक की और भारतीयों के लिए अलग कानून बनाने की सलाह तक दे डाली। ‘सादिकुल अखबार’ दिल्ली के बयान के अनुसार ‘‘बम्बई गजट व दूसरे अखबारें ने बड़ी ही ईष्र्या से लिखा है कि भारतीय समाचार पत्रों को प्रेस की आजादी नहीं देनी चाहिए क्योंकि यह लोग इसकी कदर नहीं जानते और कभी ऐसी आग लगा देते हैं कि बुझाए नहीं बुझती। बस जिस तरह और बातों में अंग्रेस और भारतीयों के लिए दो अलग-अलग कानून हैं इसी तरह से प्रेस के लिए भी दो कानून होने चाहिए’’4
जंगे आजादी में हिस्सा लेने वाले तमाम उर्दू अखबारों के बीच ‘पयाम-ए-आजादी’ नाम के एक अखबार ने अपनी विशेष जहग बनायी। आज इस अखबार का कोई अंक मौजूद नहीं है। ‘पयामे आजादी’ के बारे में सर हेनरी काटन ने अपनी किताब ष्प्दकपंद - भ्वउम डमउवतपमेष् में लिखा है कि ‘अंग्रेजों ने जब 1857 के बाद दिल्ली पर कब्जा किया तो ढूंड-ढूंड कर उन सभी लोगों को फांसी पर लटका दिया जिनके घरों में ‘पयाम-ए-आज़ादी का एक भी अंक मौजूद था’5
दिल्ली उर्दू अखबार
स्वाधीनता संग्राम में बढ़चढ़कर हिस्सा लेने वाले अखबारांे में सबसे मशहूर नाम है ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ का। ‘जामे जहांनुमा’ के बाद के बाद ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ भारत में प्रकाशित होने वाला दूसरा उर्दू अखबार है। इसे मौलवी मोहम्मद वाकर ने प्रकाशित किया था। असल मायनों में यह अखबार भारत में राष्ट्रीय उर्दू पत्रकारिता का संस्थापक है। यह अखबार उस समय राष्ट्रीय भावनाओं का प्रचारक था। उस समय जब देश में कोई राजनीतिक दल नहीं था तब ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ ने उथल पुथल भरे माहौल में जनता में रानीतिक जागरूकता पैदा करने और अंग्रेजों के खिलाफ जनता को एकजुट करने में अग्रणी व महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इस अखबार ने आम जनमानस में स्वतंत्रता के प्रति प्यार व अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के लिए साहस व आत्मविश्वास पैदा किया। इस अखबार ने पहली बार पत्रकारिता को सामाजिक मुद्दों से जोड़ दिया। 
‘दिल्ली उर्दू अखबार’ को प्रथम स्वाधीनता संग्राम के संदर्भ में इसलिए भी याद किया जाता है कि अंग्रेजों ने इस अखबार के खौफ से मौलवी मोहम्मद वाकर को शहीद कर दिया था। मौलवी मौहम्मद वाकर हिन्दू मुस्लिम एकता के महान नायक थे। जब आजादी के संघर्ष को कमजोर करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत ने जनता के बीच विवाद के बीज बोना शुरू किये तो ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ ने उन्हें चुनौती दी। 4 जून 1857 को मौलवी मोहम्मद वाकर ने जनता को ब्रिटिश षणयंत्रो की चेतावनी दी और उन्हें एक जुट रहने की अपील की। 
‘दिल्ली उर्दू अखबार’ के प्रकाशन को लेकर विद्वान एक मत नहीं हैं। कुछ इसका प्रकाशन 1838 मानते हैं वहीं कुछ का मानना है कि यह 1837 में प्रकाशित हुआ था। लेकिन ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ के मालिक मौलवी मोहम्मद वाकर के पुत्र मौलना मोहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ जो इस अखबार से जुड़े हुए भी थे उन्होंने इसका प्रकाशन काल 1835 बताया है। इस बारे में मौलाना मोहम्मद हुसैन ‘आज़ाद’ कहते हैं कि ‘‘1835 से सरकारी दफ्तर भी उर्दू होने शुरू हो गए। कुछ सालों के बाद दफ्तरों में उर्दू जुबान हो गई। इस शहर में अखबारों की आजादी हासिल हुई। 1836 में उर्दू का अखबार दिल्ली में जारी हुआ और यह इस जुबान का पहला अखबार था जो मेरे वालिद मरहूम की कलम से निकला’’6
दिल्ली उर्दू अखबार एक साप्ताहिक अखबार था जो 20ग्30 सेमी. के साइज में चार पेजों पर छपता और प्रत्येक रविवार को प्रकाशित होता था। अखबार के हर पेज पर दो काॅलम में लगभग 33 लाइनें होती थीं। अबखबार के माॅस्टहेड में अखबार को नाम और उसके नीचे इसकी कीमत लिखी होती थी। यह कीमत दो रूपये महीना थी लेकिन 6 महीने की कीमत 11 रूपये एवं वार्षिक 20 रूपये लिए जाते थे। इसके नीचे डेट लाइन (वर्ष, अंक, एवं तारीख) अंक होती थी। ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ सन् 1836 से 1857 तक लगातार प्रकाशित होता रहा। इस दौरान इसकी कीमत में कोई परिवर्तन नहीं हुआ हां इसके नाम में जरूर बदलाव होते रहे और इसके साथ ही इसके मुद्रक और प्रकाशक  भी बदलते रहे। इस बावत मोहम्मद अतीक सिद्दकी कहते हैं कि ‘‘3 मई 1940 तक अखबार का नाम ‘दिल्ली अखबार’ रहा फिर अचानक 10 मई 1940 के अंक में दिल्ली अखबार की जगह ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ नज़र आने लगा। नाम बदलने का कारण क्या था इसका कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया है।’’7 सन् 1840 के आरम्भ में मुद्रक सय्यद मोईनुद्दीन मलिक छापा जाता था। इससे यह अंदाजा होता है कि उस समय तक प्रिंटिंग प्रेस के मालिक सय्यद मोईनुद्दीन मलिक रहे होंगे। फिर एका एक सय्यद मोईनुद्दीन मलिक के मालिकाना हैसियत के साथ एक नाम और जुड़ गया इमदाद बेग का। 12 अगस्त 1840 को दोनो नाम गायब हो गए अब इनकी जगह मुद्रक व प्रकाशक मोती लाल द्वारा छपाया हुआ छापा जाने लगा।
उर्दू पत्रकारिता के प्रारम्भ काल में ईस्ट इंडिया कम्पनी की हुकूमत एवं उसके जुल्म अपने उरूज पर थे तब उस दौर में भी दिल्ली उर्दू अखबार ने कम्पनी के खिलाफ आवाज बुलन्द की। प्रथम स्वाधीनता संग्राम के समय दिल्ली उर्दू अखबार की रूप रेखा समकालीन दूसरे अखबारों के मुकाबले अधिक अमन पसंदाना थी। उसका खबारांे को पेश करने का तरीका बड़ा सीधा साधा था। इसमें छपने वाली खबरों में न तो अंग्रेजों से दुश्मनी की झलक आती थी और न ही उसकी चापलूसी का इज़हार होता था। लेकिन 1857 के गदर के बाद दिल्ली उर्दू अखबार के तेबर बदल गए और इसकी भाषा मुखर होती चली गई। दिल्ली उर्दू अखबार के 17 से 24 मई 1857 के अंकों में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी कोई खबर नजर नहीं आती जिससे उस पर प्रतिबंध लगाया जा सके। बगाबत के दो हफ्ते बाद जब हालात में थोड़ा ठहराव आ गया तो अखबार के अंदाज में इकाएक इंकलाब आ गया। अखबार के 24 मई 1857 के अंक के प्रथम पृष्ठ पर मौलान मोहम्मद हुसैन आज़ाद की नज़्म ‘इंकलाब इबरत अफ्ज़ा’ (परिवर्तन का इतिहास एक सबक है) नज़र आती है जो जनता में स्वाधीनता के प्रति उत्साह व नया देश प्रेम की नई भावना जागृत करने के उद्देश्य से प्रकाशित की गई थी। 
स्वाधीनता संग्राम के पहले दिन की रिपोर्ट 17 मई 1857 के अंक में जिस अंदाज में दिल्ली उर्दू अखबार ने प्रकाशित की वैसी किसी अन्य अखबार में प्रकाशित नहीं हुई। प्रथम स्वाधीनता संग्राम का प्रारम्भ 10 मई 1857 को मेरठ से हिन्दुस्तानी सिपाहियों की बगावत से शुरू हुई। इसके बाद 11 मई को यह सिपाही दिल्ली पहुंचे जिसके बाद दिल्ली भी बगावत की आग में दहल उठी। 17 मई 1857 को दिल्ली उर्दू अखबार का अंक जब आया तो उसके पृष्ठ अंग्रेजों के विरोध और इंकलाब से भरे पड़े थे। अखबार ने प्रथम पृष्ठ पर खबरों की शुरूआत और टाईटल में पवित्र कुरान की आयत प्रकाशित की जिसका मतलब यह है कि ‘‘इबरत (सबक) है देखने वाली अंाख के लिए’’। दिल्ली उर्दू अखबार के इस अंक में खबरों से पहले कुरान की आयतें दर्ज थीं और उसके बाद संपादक ने खुदा की बेपनाह ताकत और इज्जत व जिल्लत देने के उसके अधिकार और इंसानों को गुमराही और गफलत की ओर जबज्जो दिलायी थी। फिर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ होने वाले महान विद्रोह को विषय बनाया था। ऐसा मालूम होता था कि अचानक भड़कने वाले इंकलाब ने ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ के संपादक मौलवी मोहम्मद वाकर को झिंझोड़ कर रख दिया था। उन्हें यकीन नहीं आता था कि इंकलाब बरापा हो सकता हैै और वो फिरंगी (अंग्रेज) जो अमली तौर पर हिन्दुस्तान के सियाह सफेद के मालिक बने बैठे थे इतने मजबूर और बेवस होंगे कि विफरे हुए हिन्दुस्तानियों के हाथों मारे जा रहे हैं।7 दिल्ली उर्दू अखबार के 17 मई 1857 के अंक में प्रथम स्वाधीनता संग्राम का प्रारम्भ और उसके बाद होने वाले घटनाक्रम को विस्तार से प्रकाशित किया गया था। इसी तरह 24 मई के अंक में उत्तर भारत के कई शहरों और दिल्ली के हालात के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। इन शहरों में लखनऊ, आगरा, बुलंदशहर, कानपुर, गाजियाबाद, मेरठ, झज्झर, सिकंदरा, बल्लभगढ़, रोहतक और करनाल शामिल हैं। 
स्वाधीनता संग्राम की रिपोर्टिंग करने के अलावा मौलवी मोहममद वाकर बहादुर शाह जफर का साथ भी दे रहे थे। इस बारे में मौलवी जकाउल्लाह देहलवी अपनी किताब ‘तारीख उरूजे सल्तनत अंगाशिया हिन्द’ में लिखते हैं कि ‘‘बहादुर शाह जफर के हुक्म से वो मालगुजारी के इस शाही खजाने को कामयाबी से वा हिफाजत (सुरक्षित) लेकर आये जो पैदल फौज को एक पलटन चंद सवारों के साथ गुड़गांव से दिल्ली ला रही थी और जिस पर रास्ते में तीन सौ मेवातियों से मुडभेड़ होने के बाद लाड़ाई हो रही थी। इसके लिए वो बहादुर शाह की हिदयत पर इमदादी फौजी सिपाह (सैनिक सहायता) को साथ लेकर गए थे।’’8 मौलवी मोहम्मद वाकर के ऐसे कारनामों से खुश होकर बहादुर शाह जफर ने अपने नाम के आधार पर उनके ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ केे नाम को ‘अखबार अल जफर’ कर दिया। इसकी घोषणा 12 जुलाई 1857 के अंक में हुई और इस अखबार के आखिरी 10 अंक इसी नाम से छपे।9 
सितम्बर 1857 की शुरूआत में जब स्वाधीनता संग्राम कमजोर होने लगा और आजादी के मतवालों ने हार का सामना करना शुरू कर दिया। इससे मौलवी मोहम्मद वाकर का दिल भी टूटने लगा। इसी बीच ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ (अखबार अल जफर) का 13 सिम्बर 1857 का अंक भी आ गया और यह अंक अखबार का आखिरी अंक साबित हुआ। मौलवी मोहम्मद वाकर को विना किसी विद्रोह के उनके घर से गिरफ्तार कर लिया गया। 16 सितम्बर 1857 को मौलवी मोहम्मद वाकर अंग्रेजांे की तोप से बंधे हुए थे और खूनी दरवाजा के सामने उन्हें सार्वजनिक रूप से तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया। प्रथम स्वाधीनता संग्राम में दिल्ली उर्दू अखबार के बारे में इमदाद साबरी लिखते हैं कि ‘‘दिल्ली में जब तक जंग जारी रही उस वक्त तक दिल्ली उर्दू अखबार ने न सिर्फ अपने सफहात (पृष्ठ) आजादी को कामयाब करने के लिए वक्फ कर दिये बल्कि उसके बानी मोलवी मोहम्मद वाकर कलम की जंग के अलावा तलवार से भी अंग्रेजों से जंग लड़ी और जिस वक्त जंग नाकाम हो गई और अंग्रेज दिल्ली पर काबिज हो गए तो अखबार बंद होने के साथ साथ मौलाना मोहम्मद वाकर अंग्रेजों की गोली का निशाना बने और जामे शहादत नोश किया (वीरगति को प्राप्त हुए)’’10
मौलवी मोहम्मद वाकर की शहादत ने स्वतंत्रता संग्राम को और अधिक मजबूत किया और पत्रकारिता के स्वतंत्र, निष्पक्ष और बगावती उत्साह के संकल्प को तेज किया। समकालीन प्रकाशनों और बाद के समाचार पत्र व पत्रिकाओं ने मौलवी मोहम्मद वाकर द्वारा निर्धारित आजादी के लिए लड़ने और राष्ट्रीय भावना के मिशन का पालन किया और उसे आगे बढ़ाया। दिल्ली उर्दू अखबार अपनी बेवाक रिपोर्टिंग के बल पर पत्रकारिता के इतिहास में अमर हो गया। ‘दिल्ली उर्दू अखबार’ और उसके संपादक मौलवी मोहम्मद वाकर की कुर्बानी पत्रकारिता और भारत के इतिहास में हमेशा याद की जायेगी।

राष्ट्रीय रिसर्च जर्नल 'द जॉर्नलिस्ट' 
ISSN NO. 2231-2943 
में प्रकाशित मेरा शोध पत्र।
नोट : संदर्भ सूची यहां प्रकाशित करना मुमकिन नहीं है

Sunday, July 30, 2017

अवध के आखिरी नवाब : वाजिद अली शाह

  अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह जितना अपने कमज़ोर शासन के लिए जाने जाते हैं उतना ही नर्तक, कवि और कला पारखी होने के लिए भी | जहाँ उन्होंने कई राग रचे वहीँ कई दर्द भरी ग़ज़लें भी लिखीं |
  लखनऊ के नवाब अमजद अली शाह के घर 30 जुलाई 1822 को जन्मे वाजिद अली शाह का पूरा नाम अब्दुल मंसूर मिर्ज़ा मोहम्मद वाजिद अली था | ये अवध के दसवें और आखरी नवाब थे | वाजिद अली शाह सन 1847 में अवध के सिंघासन पर बैठे | इनके शासन के नौवें साल में अग्रेजों ने अवध को अपने संरक्षण में ले लिया और आख़िरकार 7 फरवरी 1856 को बड़े ही शांतिपूर्ण तरीके से अंग्रेजों ने अवध पर कब्ज़ा कर लिया | संगीत की दुनिया में नवाब वाजिद अली शाह का नाम बड़े अदब से लिया जाता है | ये संगीत की विधा “ठुमरी” के जन्मदाता के रूप में जाने जाते हैं | इनके ज़माने में “ठुमरी” को “कत्थक” नृत्य के साथ गया जाता था | कहा जाता है  कि  इनके दरबार में हर शाम संगीत की महफिलें सजती थीं | इन्होंने कई बेहतरीन “ठुमरियों” की रचना की | इनके बारे में प्रसिद्ध है कि जब अंग्रेजों ने लखनऊ पर कब्ज़ा कर लिया और इन्हें अपना लखनऊ छोड़ना पड़ा तो ये यह प्रसिद्ध “ठुमरी”  गाते हुए लखनऊ से विदा हुए………
"बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये,
बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाये…
चार कहर मिल मोरी डोलिया सजावें,
मोरा अपना बेगाना छूटो जाये.
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाये…
आंगन तो पर्वत भयो और देहरी भयी बिदेस,
जाये बाबुल घर आपनो मैं चली पिया के देस.
बाबुल मोरा नैहर छूटो जाये……”
  उर्दू, अरबी और फारसी के विद्वान् नवाब वाजिद अली शाह ने एक से बढ़कर एक बेहतरीन ग़ज़लें लिखीं | इनकी लिखी हुई एक दुर्लभ ग़ज़ल है………..
"साकी कि नज़र साकी का करम
सौ बार हुई सौ बार हुआ
ये सारी खुदाई ये सारा जहाँ
मैख्वार हुई मैख्वार हुआ
जब दोनों तरफ से आग लगी
राज़ी-व-रजा जलने के लिए
तब शम्मा उधर परवाना इधर
तैयार हुई तैयार हुआ |"
  नवाब वाजिद अली शाह द्वारा लिखी गई पुस्तक 'बानी' में 36 प्रकार के रहस्य वर्णित हैं। इनको कथक के साथ लयबद्ध किया गया है इनमें से प्रमुख हैं - घूँघट, सलामी, मुजरा, मोरछत्र, मोरपंखी आदि। इन के  साथ-साथ इस पुस्तक में रहस विशेष में पहनी जाने वाली पोषाकों, आभूषणों और मंचसज्जा का विस्तृत वर्णन है। अवध पर अंग्रेज़ों के कब्जे के साथ जहां हिन्दुस्तान ने परतंत्रता की तरफ क़दम बढ़ा दिए थे वहीं कला और संगीत के कद्रदानों के लिए खराब समय शुरू हो गया था।
  अंग्रेजों के देश निकला देने के बाद नवाब वाजिद अली शाह ने कलकत्ता (कोलकाता) में पनाह ली हालांकि अपनी ज़िन्दगी के बाक़ी वर्ष कलकत्ता में गुजारने के दौरान भी वाजिद अली शाह कला के लिए समर्पित रहे | 21 सितम्बर  सन 1887 में कलकत्ता के मटियाबुर्ज़ में 65 साल की उम्र में इस कला और संगीत परखी अवध के आखिरी नवाब की मौत हो गयी | लेकिन अफ़सोस नवाब वाजिद अली शाह को कला और संगीत और पारखी होने के लिए नहीं बल्कि एक कमज़ोर शासक के तौर पर जाना जाता है |

Tuesday, May 30, 2017

30 मई : 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन और हिन्दी पत्रकारिता की शुरुआत

30 मई का दिन हिंदी पत्रकारिता के लिए एक महत्वपूर्ण दिन है. इसी दिन हिंदी के पहले अखबार ने आँखें खोलीं और 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन शुरू हुआ था. इस अखबार का प्रकाशन हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा का महत्वपूर्ण बिंदु है. प्रकाशक एवं सम्पादक युगल किशोर सुकुल ने कलकत्ता के कालूटोला मोहल्ला से 30 मई 1826 को 'उदंत मार्तंड' का प्रकाशन शुरू किया था, यह एक साप्ताहिक समाचार पत्र थे. 'उदंत' का मतलब होता है समाचार और 'मार्तंड' का मतलब होता है उगता सूरज, वाकई अपने नाम की तरह सूरज की किरणों की भांति 'उदंत मार्तंड' ने हिंदी भाषा के ज़रिये अपने विचारों को आम लोगों तक फैलाया और अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की प्रष्ठभूमि तैयार करने में सहयोग दिया. युगल किशोर सुकुल ने 'उदंत मार्तंड' के पहले अंक में लिखा था कि "हिंदी भाषी अपनी मातृभाषा में सत्य समाचार पढ़कर उसका आनंद लें और उसका महत्व समझें, यही सुकुल जी की हार्दिक कामना है और प्रकाशन का सर्वोच्च लक्ष्य है".
'उदंत मार्तंड' के प्रकाशन के साथ 30 मई  की तारीख हिंदी पत्रकारिता जगत में अमर हो गयी.  'उदंत मार्तंड' के प्रकाशन के बाद और भी तमाम हिंदी के समाचार पत्र प्रकाशित हुए जैसे गोविन्दनाथ थत्ते व शिव प्रसाद 'सितारे हिन्द' का 'बनारस अखबार', तरमोहन मैत्र का 'सुधाकर', सदासुख लाल का 'बुद्धि प्रकाश', हिंदी का पहला दैनिक अखबार 'समाचार सुधावर्षण' जिसके संपादक श्याम सुन्दर सेन व प्रकाशक महेंद्र नाथ थे. इस तरह के और भी बहुत सारे समाचार पत्रों ने आजादी के संघर्ष को एक नयी धार दी. हिंदी पत्रकारिता ने आजादी से पहले, आजादी के बाद और अब 21वीं सदी के डिजिटल युग में तमाम चुनौतियों को दरकिनार करते हुए तरक्की के नए कीर्तिमान स्थापित किये हैं. हिंदी प्रेमी 30 मई का दिन 'हिंदी पत्रकारिता दिवस' के रूप में मानते हैं. तो आईये आज के दिन हम सब 'उदंत मार्तंड' और इसके संपादक व प्रकाशक युगल किशोर सुकुल को और उन तमाम भूले बिसरे हिंदी समाचार पत्रों व उनके संपादकों और प्रकाशकों व हिंदी पत्रकारिता से जुड़े उन सभी महान लोगों को याद करें जिन्होंने हिंदी पत्रकारिता की बुनियाद डाली और उसे उसे धार दी.

Saturday, February 25, 2017

लोकतंत्र का मेला

     
मारे देश में चुनाव लोकतंत्र के वो मेले हैं जो साल के 365 दिन देश में कहीं न कहीं लगे ही रहते हैं | जब यह मेले लगते हैं तो चारों तरफ रौनक ही रौनक होती है  | बहुत सारे भूखे लोगों के खाने का इंतजाम हो जाता है | बहुत सारे बेरोजगारों को काम मिल जाता है और तो और निठल्ले और निकम्मे लोग भी इतने मसरूफ हो जाते हैं कि उनसे मिलने के लिए अपॉनइन्मेंट लेना पड़ता है | चौराहे गुलज़ार हो जाते हैं | चाय की दुकानों में रौनक बढ़ जाती है | सटोरियों की भी चांदी हो जाती  है |


     चुनाव के ये मेले जब लगते हैं तो एक तरह से सावन का महीना आ जाता है | चारों ओर हरियाली ही हरियाली | हर तरफ चहल पहल | चुनाव के समय ईद का चाँद भी निकलता है, बैसे तो ईद का चाँद हर साल निकलता लेकिन यह चाँद पांच साल के बाद निकलता है और कभी-कभी किस्मत से मध्यावधि में भी नमूदार हो जाता है | चुनाव के इस मौसम में उल्लू भी रात में शिकार पर निकलते हैं, जो अपने शिकार के घर की कुण्डियाँ खट खटाकर परेशान करते रहते हैं | वहीँ कुछ झींगुर और मेंढक जैसे छोटे और निम्न जीव जंतु भी नारे लगते हुए सारी रात सोये हुए लोगों की नींद में खलल डालते रहते हैं |


     इन मेलों में वादों की मूसलाधार बारिश भी होती है | इस बरसात में बरसों से प्यासे भूखे, नंगे, ग़रीब और उम्मीदों की एक बूँद को तरस रहे आम आदमी खूब तर बतर होते हैं | यहाँ सभाओं में उम्मीदों और सुहाने सपनों की भी खूब रेवड़ियाँ बांटी जाती हैं | ख्वाबों को ऐसे पंख लगाये जाते हैं कि कल तक ज़मीन में रेंगने वाले लोग आसमान में लम्बी परवाज़ पर निकल जाते हैं |


     लोगों की उम्मीदों को हकीकत की ज़मीन तब मिलती है जब जब मेला उजाड़ जाता है, ईद का चाँद छुप जाता है मेले के उजड़ने के साथ ही सपने बिखर जाते हैं, उमीदें चकनाचूर हो जाती हैं, निठल्ले और निकम्मे लोग फिर अपने पुराने काम पर लौट जाते हैं | चाय की दुकानों पर चर्चाओं का बाज़ार ख़त्म हो जाता है, चौराहों की रौनक ख़त्म हो जाती है, सपनो के पर क़तर जाते हैं, उम्मीदों की परवाज़ थम जाती है, उल्लू अपना शिकार करके लौट जाता है, निम्न जीव जंतुओं के नारे बंद हो जाते हैं | आम आदमी अब आराम से सोयेगा अगले मेले के आने तक……..|